भारतीय अदालतें मानती हैं कि शिक्षित और सक्षम पत्नी काम कर सकती है, फिर भी व्यवहार में भरण-पोषण का बोझ पति पर ही डाला जाता है। कानून में मान्यता और ज़मीनी हकीकत के बीच यही अंतर पुरुषों की सबसे बड़ी कानूनी पीड़ा बन चुका है।
नई दिल्ली: भारत में मेंटेनेंस के कानूनों का उद्देश्य वैवाहिक विवाद या अलग होने के बाद आर्थिक तंगी को रोकना और मानवीय गरिमा की रक्षा करना है। इन कानूनों को कभी भी आजीवन आर्थिक गारंटी या वैवाहिक मुकदमों में रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए नहीं बनाया गया था। भारतीय अदालतें बार-बार स्पष्ट कर चुकी हैं कि मेंटेनेंस का मकसद वास्तविक आर्थिक आवश्यकता को पूरा करना है, न कि किसी सक्षम व्यक्ति को जानबूझकर आर्थिक निर्भरता में बनाए रखना।
समय के साथ, मेंटेनेंस से जुड़े मुकदमों ने सुरक्षा और जवाबदेही के बीच एक गंभीर कानूनी टकराव को उजागर किया है । जिससे यह स्पष्ट हुआ है कि कई पति, पत्नी की कमाने की स्पष्ट क्षमता होने के बावजूद, आर्थिक और मानसिक दबाव झेलने के लिए विवश हैं।
क्या केवल शिक्षा के आधार पर भरण-पोषण से इनकार किया जा सकता है?
अगर बात केवल शिक्षा के आधार पर मेंटेनेंस निर्धारित करने की है तो इसका जवाब है नहीं, परन्तु मेंटेनेंस निर्धारित करते समय इसे एक महत्त्वपूर्ण आधार माना जाता है ।
सिर्फ किसी महिला के पास डिग्री होना उसे भरण-पोषण से स्वतः वंचित नहीं करता। लेकिन जब शिक्षा के साथ रोजगार-योग्यता, पेशेवर योग्यता, व्यावहारिक कौशल या एक्सपीरियंस जुड़ा हो, तो अदालतें यह सवाल उठाती हैं कि वह काम क्यों नहीं कर रही है।
भारतीय अदालतों का दृष्टिकोण स्पष्ट है—जानबूझकर बेरोजगारी को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता।
यहाँ शिक्षा तब कानूनी रूप से प्रासंगिक बनती है जब वह कमाने की क्षमता दर्शाती है, न कि केवल शैक्षणिक उपलब्धि।
मेंटेनेंस का उद्देश्य आर्थिक विवशता से बचाना है ना कि आलस को बढ़ावा देना । इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि “क्या वह शिक्षित है?”, बल्कि यह है:
- क्या वह शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम है?
- क्या उसके पास योग्यता या कौशल है?
- क्या उसमें कमाने की वास्तविक क्षमता है?
- क्या वह जानबूझकर काम न करने का निर्णय ले रही है?
मेंटेनेंस कानून व्यवहारिक और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर मूल्यांकन करता है, न कि प्रतीकात्मक या केवल सहानुभूति को आधार बना कर।
अदालतें इन सभी पहलुओं को मिलाकर यह तय करती हैं कि मेंटेनेंस वास्तव में आर्थिक कठिनाई रोकने में सहायक होगा, या फिर यह जानबूझकर निर्भरता को बढ़ावा देगा।
अदालतें कैसे संतुलन स्थापित करती हैं ?
अदालतों के पास ऐसा कोई वैज्ञानिक फार्मूला नहीं है जिससे वे इन सभी कारकों के आधार पर मेंटेनेंस तय कर सकें, असल में ये चारों कारकों में एक संतुलन बनाती हैं जिससे वास्तविक कठिनाई से बचा जा सके और निष्क्रियता को बढ़ावा ना मिले।
जहाँ वास्तविक आवश्यकता होती है, वहाँ भरण-पोषण दिया जाता है।
जहाँ क्षमता तो होती है लेकिन प्रयास नहीं, वहाँ अदालतें संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं, और मेंटेनेंस की रकम कम कर दी जाती है ।
मेंटेनेंस कानूनों में पत्नी की कमाने की क्षमता का आकलन
मेंटेनेंस से जुड़े प्रमुख प्रावधानों, जैसे- धारा 125 CrPC, हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 24 और 25, तथा घरेलू हिंसा अधिनियम (DV ACT) इत्यादि, सभी कानूनों के अंतर्गत जो समान सिद्धांत अपनाया जाता है, वह है : आर्थिक आवश्यकताओं का मूल्यांकन कमाने की क्षमता के साथ किया जाना चाहिए।
- धारा 125 CrPC: इसके अंतर्गत डिग्री के अलावा यह भी देखा जाता है कि, मेंटेनेंस की मांग करने वाली पत्नी, स्वयं कितनी सक्षम है, वह स्वस्थ एवं शिक्षित है या नहीं, नौकरी का अनुभव इत्यादि, अगर वह सारी सक्षमताओं के बाद भी बेरोज़गारी का निर्णय लेती है तो मेंटेनेंस निर्धारित करते समय इसे ध्यान में रखा जाता है ।
- हिंदू विवाह अधिनियम (HMA): धारा 24 के अंतर्गत अंतरिम मेंटेनेंस को निर्धारित करते समय तात्कालिक जरूरतों को ध्यान में रखा जाता है और धारा 25 के तहत परमानेंट एलिमनी में योग्यता, पूर्व रोजगार अनुभव और आत्मनिर्भरता की वास्तविक संभावना देखी जाती है। शिक्षित और रोजगार-योग्य पत्नी के मामलों में अदालतें परमानेंट एलिमनी को लेकर अधिक सतर्क रहती हैं, और इसे घटाया या नकारा जा सकता है।
- घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act): इसमें भी मेंटेनेंस स्वतः नहीं मिलता। शिक्षा, रोजगार-योग्यता और आत्मनिर्भर बनने के वास्तविक प्रयासों की जाँच की जाती है और उसकी के आधार पर मेंटेनेंस निर्धारित किया जाता है।
- न्यायिक प्रचलन (समर्थन और उत्तरदायित्व का संतुलन): हाल के न्यायिक फ़ैसले, सुरक्षा और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने के सचेत प्रयासों को दर्शाते हैं। हालांकि वास्तविक रूप से कमजोर लोगों को समर्थन मिलता रहता है, लेकिन वर्तमान बेरोजगारी के बजाय संभावित आय क्षमता निर्णायक कारक बनती जा रही है।
वे परिस्थितियाँ जहाँ मेंटेनेंस के दावे पर गंभीर सवाल उठते हैं
जब पत्नी अच्छी तरह शिक्षित, पेशेवर रूप से योग्य या पहले से कार्य-अनुभव रखने वाली होती है, लेकिन फिर भी काम नहीं करती, तो ऐसे मामलों में अदालतें दावे की कड़ी जाँच करती हैं।
अनेक पति उस समय तीव्र आर्थिक और मानसिक दबाव झेलते हैं जब पत्नी की कमाने की क्षमता के बावजूद भरण-पोषण माँगा जाता है। अदालतें विशेष रूप से उन मामलों पर ध्यान देती हैं जहाँ पत्नी ने:
- अपनी इच्छा से नौकरी छोड़ी हो
- काम ढूंढने का कोई ईमानदार प्रयास न किया हो
- आय या संपत्ति को शपथपत्र में छिपाया हो
इन परिस्थितियों में भरण-पोषण सहायता के बजाय आर्थिक दबाव का साधन बन सकता है—विशेषकर तब, जब पति पहले से मुकदमे का खर्च, आवासीय व्यय और सामाजिक कलंक झेल रहा हो।
फिर भी असलियत में, इन कारणों के होते हुए भी मेंटेनेंस को पूर्णतः बहुत कम इंकार किया जाता है । अक्सर पुरुषों को कम राशि पर ही सही, भुगतान जारी रखने का आदेश दिया जाता है—जिससे पुरुषों की आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर हो जाती है।
शिक्षित पत्नियों के भरण-पोषण पर न्यायिक व्याख्या
Chaturbhuj v. Sita Bai (2008), SC:सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मूल्यांकन इस बात का होना चाहिए कि क्या पत्नी अपना भरण-पोषण करने में समर्थ है या नहीं, न कि पति के भुगतान कर सकने की सक्षमता को। इस फैसले ने सहानुभूति के बजाय आय क्षमता के मूल्यांकन की नींव रखी।।
Shamima Farooqui v. Shahid Khan (2015), SC: मेंटेनेंस के अधिकार की पुष्टि करते हुए, न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि इसका उद्देश्य बेबसी को रोकना है, न कि निर्भरता पैदा करना – जिसका हवाला अक्सर पुरुष द्वारा अपने खिलाफ बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों में बचाव के लिए दिया जाता है।
Manish Jain v. Akanksha Jain (2017), SC: न्यायालय ने माना कि मेंटेनेंस उचित और तर्कसंगत होना चाहिए, जिसमें पत्नी की योग्यता और पति की क्षमता को ध्यान में रखा जाए, और चेतावनी दी की मेंटेनेंस को मूल रूप से महिलाओं के लिए आर्थिक पुरस्कार ना समझा जाये।
Mamta v. Rajesh (2018), Delhi High Court: पत्नी के योग्य, सक्षम एवं जानबूझ कर बेरोजगार होने के कारण, मेंटेनेंस से इंकार कर दिया गया, जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि अगर सही तथ्य दिए जाएँ तो अदालतें आय का अनुमान लगाकर मेंटेनेंस से इंकार भी करती हैं।
Rajnesh v. Neha (2020), SC: दोनों पक्षों से आय संबंधी शपथ-पत्र अनिवार्य करके, न्यायालय ने अप्रत्यक्ष रूप से पुरुषों को आय के दमन और झूठे आश्रितता दावों को उजागर करने के लिए सशक्त बनाया।
न्यायिक सोच में विकास : सिर्फ मान्यता, पूर्ण राहत नहीं
मेंटेनेंस कानून में बदलाव आ रहा है, और अदालतें अब खुले तौर पर यह भी स्वीकार करती हैं कि शिक्षा और कमाने की क्षमता मायने रखती है। हालांकि, यह मान्यता अभी तक पूरी तरह से राहत देने में विफल रही है।
अदालतें यह तो स्वीकार कर सकती हैं कि पत्नी कमाने में सक्षम है, फिर भी इस आधार पर मेंटेनेंस का आदेश दे सकती हैं, इस तर्क के साथ कि वह वर्तमान में कार्यरत नहीं है या उसे आत्मनिर्भर होने के लिए समय चाहिए। परिणामस्वरूप, रिकॉर्ड में अनुकूल प्रावधान होने के बावजूद, पुरुष लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों के दौरान वित्तीय जिम्मेदारी निभाते रहते हैं।
कानूनी सिद्धांत और व्यावहारिक परिणाम के बीच यह अंतर इस बात को उजागर करता है कि प्रगतिशील रूप से तर्कसंगत कानूनी ढांचे के भीतर भी पुरुष आर्थिक रूप से कितने असुरक्षित बने रहते हैं।
निष्कर्ष: पुरुषों के लिए मेंटेनेंस कानून की कठोर सच्चाई
ववर्तमान कानूनी स्थिति एक कड़वी सच्चाई को दर्शाती है। एक शिक्षित पत्नी स्वतः ही मेंटेनेंस के अपने अधिकार से वंचित नहीं हो जाती, और कई मामलों में, आय क्षमता के संबंध में वैध तर्कों के बावजूद भी पति को भरण-पोषण का भुगतान करने का निर्देश दिया जाता है।
भरण-पोषण का मामला तथ्यों पर आधारित होता है, लेकिन वर्तमान में वित्तीय बोझ लगभग हमेशा पति पर ही पड़ता है। पुरुषों के लिए, इसका अर्थ है एक ऐसी व्यवस्था से निपटना जो सैद्धांतिक रूप से दुरुपयोग को स्वीकार करती है, लेकिन असलियत में हमेशा वित्तीय दायित्व को बनाये रखती है—जिससे मेंटेनेंस संबंधी केस न केवल एक कानूनी लड़ाई बन जाती है, बल्कि आर्थिक और भावनात्मक सहनशक्ति की एक लंबी परीक्षा भी बन जाती है।
विधायी प्रावधान (Statutory Provisions)
| कानून / धारा | संबंधित अधिनियम | किसके लिए लागू | कानूनी उद्देश्य | कमाने की क्षमता पर न्यायिक दृष्टिकोण |
| Section 125 | दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) | पत्नी, बच्चे, माता-पिता | आर्थिक बदहाली रोकना | केवल डिग्री नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, योग्यता, अनुभव और स्वैच्छिक बेरोज़गारी पर विचार किया जाता है |
| Section 24 | हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) | पति / पत्नी | मुकदमे के दौरान अंतरिम भरण-पोषण | तात्कालिक ज़रूरतें देखी जाती हैं, पर शिक्षित पत्नी की क्षमता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता |
| Section 25 | हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) | पति / पत्नी | स्थायी गुज़ारा भत्ता (Permanent Alimony) | योग्यता, पूर्व रोजगार और आत्मनिर्भरता की संभावना निर्णायक कारक |
| Section 20 | घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) | पत्नी | आर्थिक राहत व मेंटेनेंस | मेंटेनेंस स्वतः नहीं—कमाने की क्षमता और प्रयासों की जाँच अनिवार्य |
प्रमुख न्यायिक निर्णय (Case Laws Interpretation)
| केस नाम | न्यायालय / वर्ष | मुख्य कानूनी सिद्धांत | शिक्षित / सक्षम पत्नी पर प्रभाव |
| Chaturbhuj v. Sita Bai | सुप्रीम कोर्ट, 2008 | पत्नी आत्मनिर्भर है या नहीं—यह निर्णायक प्रश्न | सहानुभूति नहीं, आय क्षमता का मूल्यांकन आवश्यक |
| Shamima Farooqui v. Shahid Khan | सुप्रीम कोर्ट, 2015 | मेंटेनेंस का उद्देश्य बेबसी रोकना है | निर्भरता को बढ़ावा देना कानून का उद्देश्य नहीं |
| Manish Jain v. Akanksha Jain | सुप्रीम कोर्ट, 2017 | मेंटेनेंस उचित और तर्कसंगत होना चाहिए | इसे महिलाओं के लिए “आर्थिक पुरस्कार” नहीं माना जा सकता |
| Mamta v. Rajesh | दिल्ली हाईकोर्ट, 2018 | जानबूझकर बेरोज़गारी अस्वीकार्य | सक्षम पत्नी को मेंटेनेंस से इंकार किया गया |
| Rajnesh v. Neha | सुप्रीम कोर्ट, 2020 | आय-शपथपत्र अनिवार्य | झूठी निर्भरता और आय छिपाने पर रोक |
सिस्टम की व्यावहारिक वास्तविकता (Ground Reality Table)
| कानूनी सिद्धांत | सैद्धांतिक स्थिति | ज़मीनी हकीकत |
| कमाने की क्षमता | मान्य | अक्सर केवल राशि घटती है, समाप्त नहीं होती |
| स्वैच्छिक बेरोज़गारी | अस्वीकार्य | फिर भी अंतरिम मेंटेनेंस जारी |
| अंतरिम भरण-पोषण | अस्थायी राहत | वर्षों तक स्थायी बोझ बन जाता है |
| लैंगिक निष्पक्षता | कागज़ पर मौजूद | आर्थिक भार लगभग हमेशा पुरुष पर |
मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaways)
- भारतीय कानून कमाने की क्षमता को मानता है, लेकिन व्यवहार में मेंटेनेंस का बोझ लगभग हमेशा पति पर ही डाला जाता है।
- शिक्षित और सक्षम पत्नी की स्वैच्छिक बेरोज़गारी अक्सर केवल राशि घटाती है, जिम्मेदारी समाप्त नहीं करती।
- अंतरिम मेंटेनेंस “अस्थायी राहत” नहीं रह गया, बल्कि वर्षों तक चलने वाला आर्थिक दंड बन चुका है।
- कानून दुरुपयोग को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार करता है, पर पुरुषों को व्यावहारिक राहत देने में विफल रहता है।
- मेंटेनेंस सिस्टम आज भी इस धारणा पर चलता है कि पति हमेशा भुगतान करने में सक्षम होता है।
FAQs
हाँ। केवल शिक्षा भरण-पोषण से वंचित नहीं करती, इसी कारण पुरुष असुरक्षित रहते हैं।
सिद्धांत के अनुसार हाँ, लेकिन व्यवहार में केवल रकम कम होती है।
बहुत कम मामलों में ऐसा होता है। अंतरिम मेंटेनेंस आमतौर पर जारी रहता है।
क्योंकि अदालतें सावधानी के नाम पर पहले भुगतान और बाद में विवाद का रास्ता अपनाती हैं—जो वर्षों चल सकता है।
कागज़ पर हाँ, ज़मीनी स्तर पर आर्थिक बोझ अब भी पुरुषों पर ही रहता है।


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