Site icon Shonee Kapoor

कानून मानता है पढ़ी-लिखी पत्नी कमा सकती है, फिर भी आदेश पति को ही भुगतना है: अदालत और मेंटेनेंस सिस्टम की सच्चाई

पढ़ी-लिखी पत्नी कमा सकती है, फिर भी पति पर मेंटेनेंस

पढ़ी-लिखी पत्नी कमा सकती है, फिर भी पति पर मेंटेनेंस

भारतीय अदालतें मानती हैं कि शिक्षित और सक्षम पत्नी काम कर सकती है, फिर भी व्यवहार में भरण-पोषण का बोझ पति पर ही डाला जाता है। कानून में मान्यता और ज़मीनी हकीकत के बीच यही अंतर पुरुषों की सबसे बड़ी कानूनी पीड़ा बन चुका है।

नई दिल्ली: भारत में मेंटेनेंस के कानूनों का उद्देश्य वैवाहिक विवाद या अलग होने के बाद आर्थिक तंगी को रोकना और मानवीय गरिमा की रक्षा करना है। इन कानूनों को कभी भी आजीवन आर्थिक गारंटी या वैवाहिक मुकदमों में रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए नहीं बनाया गया था। भारतीय अदालतें बार-बार स्पष्ट कर चुकी हैं कि मेंटेनेंस का मकसद वास्तविक आर्थिक आवश्यकता को पूरा करना है, न कि किसी सक्षम व्यक्ति को जानबूझकर आर्थिक निर्भरता में बनाए रखना।

समय के साथ, मेंटेनेंस से जुड़े मुकदमों ने सुरक्षा और जवाबदेही के बीच एक गंभीर कानूनी टकराव को उजागर किया है । जिससे यह स्पष्ट हुआ है कि कई पति, पत्नी की कमाने की स्पष्ट क्षमता होने के बावजूद, आर्थिक और मानसिक दबाव झेलने के लिए विवश हैं।

क्या केवल शिक्षा के आधार पर भरण-पोषण से इनकार किया जा सकता है?

अगर बात केवल शिक्षा के आधार पर मेंटेनेंस निर्धारित करने की है तो इसका जवाब है नहीं, परन्तु मेंटेनेंस निर्धारित करते समय इसे एक महत्त्वपूर्ण आधार माना जाता है ।

सिर्फ किसी महिला के पास डिग्री होना उसे भरण-पोषण से स्वतः वंचित नहीं करता। लेकिन जब शिक्षा के साथ रोजगार-योग्यता, पेशेवर योग्यता, व्यावहारिक कौशल या एक्सपीरियंस जुड़ा हो, तो अदालतें यह सवाल उठाती हैं कि वह काम क्यों नहीं कर रही है।

भारतीय अदालतों का दृष्टिकोण स्पष्ट है—जानबूझकर बेरोजगारी को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता।
यहाँ शिक्षा तब कानूनी रूप से प्रासंगिक बनती है जब वह कमाने की क्षमता दर्शाती है, न कि केवल शैक्षणिक उपलब्धि।

मेंटेनेंस का उद्देश्य आर्थिक विवशता से बचाना है ना कि आलस को बढ़ावा देना । इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि “क्या वह शिक्षित है?”, बल्कि यह है:

मेंटेनेंस कानून व्यवहारिक और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर मूल्यांकन करता है, न कि प्रतीकात्मक या केवल सहानुभूति को आधार बना कर।

अदालतें इन सभी पहलुओं को मिलाकर यह तय करती हैं कि मेंटेनेंस वास्तव में आर्थिक कठिनाई रोकने में सहायक होगा, या फिर यह जानबूझकर निर्भरता को बढ़ावा देगा।

अदालतें कैसे संतुलन स्थापित करती हैं ?

अदालतों के पास ऐसा कोई वैज्ञानिक फार्मूला नहीं है जिससे वे इन सभी कारकों के आधार पर मेंटेनेंस तय कर सकें, असल में ये चारों कारकों में एक संतुलन बनाती हैं जिससे वास्तविक कठिनाई से बचा जा सके और निष्क्रियता को बढ़ावा ना मिले।

जहाँ वास्तविक आवश्यकता होती है, वहाँ भरण-पोषण दिया जाता है।
जहाँ क्षमता तो होती है लेकिन प्रयास नहीं, वहाँ अदालतें संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं, और मेंटेनेंस की रकम कम कर दी जाती है ।

मेंटेनेंस कानूनों में पत्नी की कमाने की क्षमता का आकलन

मेंटेनेंस से जुड़े प्रमुख प्रावधानों, जैसे- धारा 125 CrPC, हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 24 और 25, तथा घरेलू हिंसा अधिनियम (DV ACT)  इत्यादि, सभी कानूनों के अंतर्गत जो समान सिद्धांत अपनाया जाता है, वह है : आर्थिक आवश्यकताओं का मूल्यांकन कमाने की क्षमता के साथ किया जाना चाहिए।

वे परिस्थितियाँ जहाँ मेंटेनेंस के दावे पर गंभीर सवाल उठते हैं

जब पत्नी अच्छी तरह शिक्षित, पेशेवर रूप से योग्य या पहले से कार्य-अनुभव रखने वाली होती है, लेकिन फिर भी काम नहीं करती, तो ऐसे मामलों में अदालतें दावे की कड़ी जाँच करती हैं।

अनेक पति उस समय तीव्र आर्थिक और मानसिक दबाव झेलते हैं जब पत्नी की कमाने की क्षमता के बावजूद भरण-पोषण माँगा जाता है। अदालतें विशेष रूप से उन मामलों पर ध्यान देती हैं जहाँ पत्नी ने:

इन परिस्थितियों में भरण-पोषण सहायता के बजाय आर्थिक दबाव का साधन बन सकता है—विशेषकर तब, जब पति पहले से मुकदमे का खर्च, आवासीय व्यय और सामाजिक कलंक झेल रहा हो।

फिर भी असलियत में, इन कारणों के होते हुए भी मेंटेनेंस को पूर्णतः बहुत कम इंकार किया जाता है । अक्सर पुरुषों को कम राशि पर ही सही, भुगतान जारी रखने का आदेश दिया जाता है—जिससे पुरुषों की आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर हो जाती है।

शिक्षित पत्नियों के भरण-पोषण पर न्यायिक व्याख्या

Chaturbhuj v. Sita Bai (2008), SC:सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मूल्यांकन इस बात का होना चाहिए कि क्या पत्नी अपना भरण-पोषण करने में समर्थ है या नहीं, न कि पति के भुगतान कर सकने की सक्षमता को। इस फैसले ने सहानुभूति के बजाय आय क्षमता के मूल्यांकन की नींव रखी।।

Shamima Farooqui v. Shahid Khan (2015), SC: मेंटेनेंस के अधिकार की पुष्टि करते हुए, न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि इसका उद्देश्य बेबसी को रोकना है, न कि निर्भरता पैदा करना – जिसका हवाला अक्सर पुरुष द्वारा अपने खिलाफ बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों में बचाव के लिए दिया जाता है।

Manish Jain v. Akanksha Jain (2017), SC: न्यायालय ने माना कि मेंटेनेंस उचित और तर्कसंगत होना चाहिए, जिसमें पत्नी की योग्यता और पति की क्षमता को ध्यान में रखा जाए, और चेतावनी दी की मेंटेनेंस को मूल रूप से महिलाओं के लिए आर्थिक पुरस्कार ना समझा जाये।

Mamta v. Rajesh (2018), Delhi High Court: पत्नी के योग्य, सक्षम एवं जानबूझ कर बेरोजगार होने के कारण, मेंटेनेंस से इंकार कर दिया गया, जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि अगर सही तथ्य दिए जाएँ तो अदालतें आय का अनुमान लगाकर मेंटेनेंस से इंकार भी करती हैं।

Rajnesh v. Neha (2020), SC: दोनों पक्षों से आय संबंधी शपथ-पत्र अनिवार्य करके, न्यायालय ने अप्रत्यक्ष रूप से पुरुषों को आय के दमन और झूठे आश्रितता दावों को उजागर करने के लिए सशक्त बनाया।

न्यायिक सोच में विकास : सिर्फ मान्यता, पूर्ण राहत नहीं

मेंटेनेंस कानून में बदलाव आ रहा है, और अदालतें अब खुले तौर पर यह भी स्वीकार करती हैं कि शिक्षा और कमाने की क्षमता मायने रखती है। हालांकि, यह मान्यता अभी तक पूरी तरह से राहत देने में विफल रही है।

अदालतें यह तो स्वीकार कर सकती हैं कि पत्नी कमाने में सक्षम है, फिर भी इस आधार पर मेंटेनेंस का आदेश दे सकती हैं, इस तर्क के साथ कि वह वर्तमान में कार्यरत नहीं है या उसे आत्मनिर्भर होने के लिए समय चाहिए। परिणामस्वरूप, रिकॉर्ड में अनुकूल प्रावधान होने के बावजूद, पुरुष लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों के दौरान वित्तीय जिम्मेदारी निभाते रहते हैं।

कानूनी सिद्धांत और व्यावहारिक परिणाम के बीच यह अंतर इस बात को उजागर करता है कि प्रगतिशील रूप से तर्कसंगत कानूनी ढांचे के भीतर भी पुरुष आर्थिक रूप से कितने असुरक्षित बने रहते हैं।

निष्कर्ष: पुरुषों के लिए मेंटेनेंस कानून की कठोर सच्चाई

ववर्तमान कानूनी स्थिति एक कड़वी सच्चाई को दर्शाती है। एक शिक्षित पत्नी स्वतः ही मेंटेनेंस के अपने अधिकार से वंचित नहीं हो जाती, और कई मामलों में, आय क्षमता के संबंध में वैध तर्कों के बावजूद भी पति को भरण-पोषण का भुगतान करने का निर्देश दिया जाता है।

भरण-पोषण का मामला तथ्यों पर आधारित होता है, लेकिन वर्तमान में वित्तीय बोझ लगभग हमेशा पति पर ही पड़ता है। पुरुषों के लिए, इसका अर्थ है एक ऐसी व्यवस्था से निपटना जो सैद्धांतिक रूप से दुरुपयोग को स्वीकार करती है, लेकिन असलियत में हमेशा वित्तीय दायित्व को बनाये रखती है—जिससे मेंटेनेंस संबंधी केस न केवल एक कानूनी लड़ाई बन जाती है, बल्कि आर्थिक और भावनात्मक सहनशक्ति की एक लंबी परीक्षा भी बन जाती है।

विधायी प्रावधान (Statutory Provisions)

कानून / धारासंबंधित अधिनियमकिसके लिए लागूकानूनी उद्देश्यकमाने की क्षमता पर न्यायिक दृष्टिकोण
Section 125दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)पत्नी, बच्चे, माता-पिताआर्थिक बदहाली रोकनाकेवल डिग्री नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, योग्यता, अनुभव और स्वैच्छिक बेरोज़गारी पर विचार किया जाता है
Section 24हिंदू विवाह अधिनियम (HMA)पति / पत्नीमुकदमे के दौरान अंतरिम भरण-पोषणतात्कालिक ज़रूरतें देखी जाती हैं, पर शिक्षित पत्नी की क्षमता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता
Section 25हिंदू विवाह अधिनियम (HMA)पति / पत्नीस्थायी गुज़ारा भत्ता (Permanent Alimony)योग्यता, पूर्व रोजगार और आत्मनिर्भरता की संभावना निर्णायक कारक
Section 20घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act)पत्नीआर्थिक राहत व मेंटेनेंसमेंटेनेंस स्वतः नहीं—कमाने की क्षमता और प्रयासों की जाँच अनिवार्य

प्रमुख न्यायिक निर्णय (Case Laws Interpretation)

केस नामन्यायालय / वर्षमुख्य कानूनी सिद्धांतशिक्षित / सक्षम पत्नी पर प्रभाव
Chaturbhuj v. Sita Baiसुप्रीम कोर्ट, 2008पत्नी आत्मनिर्भर है या नहीं—यह निर्णायक प्रश्नसहानुभूति नहीं, आय क्षमता का मूल्यांकन आवश्यक
Shamima Farooqui v. Shahid Khanसुप्रीम कोर्ट, 2015मेंटेनेंस का उद्देश्य बेबसी रोकना हैनिर्भरता को बढ़ावा देना कानून का उद्देश्य नहीं
Manish Jain v. Akanksha Jainसुप्रीम कोर्ट, 2017मेंटेनेंस उचित और तर्कसंगत होना चाहिएइसे महिलाओं के लिए “आर्थिक पुरस्कार” नहीं माना जा सकता
Mamta v. Rajeshदिल्ली हाईकोर्ट, 2018जानबूझकर बेरोज़गारी अस्वीकार्यसक्षम पत्नी को मेंटेनेंस से इंकार किया गया
Rajnesh v. Nehaसुप्रीम कोर्ट, 2020आय-शपथपत्र अनिवार्यझूठी निर्भरता और आय छिपाने पर रोक

सिस्टम की व्यावहारिक वास्तविकता (Ground Reality Table)

कानूनी सिद्धांतसैद्धांतिक स्थितिज़मीनी हकीकत
कमाने की क्षमतामान्यअक्सर केवल राशि घटती है, समाप्त नहीं होती
स्वैच्छिक बेरोज़गारीअस्वीकार्यफिर भी अंतरिम मेंटेनेंस जारी
अंतरिम भरण-पोषणअस्थायी राहतवर्षों तक स्थायी बोझ बन जाता है
लैंगिक निष्पक्षताकागज़ पर मौजूदआर्थिक भार लगभग हमेशा पुरुष पर

मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaways)

FAQs

हाँ। केवल शिक्षा भरण-पोषण से वंचित नहीं करती, इसी कारण पुरुष असुरक्षित रहते हैं।

सिद्धांत के अनुसार हाँ, लेकिन व्यवहार में केवल रकम कम होती है।

बहुत कम मामलों में ऐसा होता है। अंतरिम मेंटेनेंस आमतौर पर जारी रहता है।

क्योंकि अदालतें सावधानी के नाम पर पहले भुगतान और बाद में विवाद का रास्ता अपनाती हैं—जो वर्षों चल सकता है।

कागज़ पर हाँ, ज़मीनी स्तर पर आर्थिक बोझ अब भी पुरुषों पर ही रहता है।

Exit mobile version