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498A का सच: झूठे मामलों में गिरफ्तारी नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने पुरुषों की स्वतंत्रता पर खींची लाल रेखा

498A का सच: सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी पर लगाई रोक

498A का सच: सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी पर लगाई रोक

धारा 498A के नाम पर बिना जांच गिरफ्तारी ने हजारों निर्दोष पुरुषों और परिवारों की जिंदगी तबाह की है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि 498A गिरफ्तारी का कानून नहीं है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है।

नई दिल्ली : भारतीय दंड संहिता की धारा 498A को लागू करने का उद्देश्य विवाहित महिलाओं को क्रूरता एवं दहेज उत्पीड़न से बचाना था ताकि उन्हें किसी अनहोनी का सामना ना करना पड़े, पर सवाल यह है कि:

जिसके कारण वे अपने जीने की स्वतंत्रता के अधिकार (भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21) के लिए भी गिड़गिड़ाने को मजबूर हो गए हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि, इस कानून क व्यापक दुरूपयोग हुआ है, गिरफ्तारियां बड़े पैमाने पर हुई हैं, कई परिवार बिखर गए, इसमें पुरुषों को दोषी पहले मान लिया गया और सुनवाई बाद में हुई ।

आपराधिक कानून के इस दुरुपयोग को देखते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्दोष पतियों, वृद्ध माता-पिता, बहनों और यहां तक ​​कि नाबालिग रिश्तेदारों को झूठे और बदले की नियत से किये गए मुकदमों से बचाने के लिए संवैधानिक सीमाएं निर्धारित करने के उद्देश्य से बार-बार निर्देश दिए हैं ।

धारा 498A (IPC)  की पृष्ठभूमि

धारा 498A को Criminal Law (Second Amendment) Act, 1983 के माध्यम से लागू किया गया था और यह 25 दिसंबर 1983 से प्रभाव में आया। इसके तहत पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की गई क्रूरता को अपराध की श्रेणी में रखा गया, जिससे यह अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती बन गया, जिसके लिए तीन साल तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।

इसका उद्देश्य स्पष्ट था, दहेज हत्याओं और विवाहित महिलाओं के प्रति क्रूरता पर अंकुश लगाना।
हालांकि, इसका परिणाम यह हुआ कि पीड़ितों का एक नया वर्ग बन गया—पुरुष और उनका परिवार—जो प्रतिशोध, दबाव या वित्तीय शोषण के लिए दायर किए गए झूठे मुकदमों में फंस गए।
जैसे-जैसे इसका दुरुपयोग बढ़ता गया, संवैधानिक न्यायालयों को हस्तक्षेप करने के लिए विवश होना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट के वे ऐतिहासिक फैसले जो धारा 498A के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने में सफल रहे

Arnesh Kumar v. State of Bihar

धारा 498A के तहत गिरफ्तारी पर यह सबसे निर्णायक फैसला है। सुप्रीम कोर्ट ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि यह प्रावधान “ढाल के बजाय हथियार” बन गया था और इसके दुरुपयोग को कानूनी आतंकवाद बताया गया।

मुख्य दिशा-निर्देश :

Rajesh Sharma v. State of Uttar Pradesh

न्यायालय ने इस बात को स्वीकार किया कि धारा 498A के तहत झूठे मामले व्यक्तिगत प्रतिशोध की भावना से दर्ज किए जाते हैं, जिससे पूरे परिवार को आपराधिक मुकदमेबाजी में घसीटा जाता है।

मुख्य दिशा-निर्देश :

Social Action Forum for Manav Adhikar v. Union of India

न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि धारा 498A का दुरुपयोग एक गंभीर चिंता का विषय है और अर्नेश कुमार  मामले में निर्धारित संवैधानिक सुरक्षा उपायों को बरकरार रखा।

मुख्य दिशा-निर्देश:

Preeti Gupta v. State of Jharkhand

कोर्ट ने रिश्तेदारों, विशेषतः अलग रह रहे बुजुर्ग माता-पिता और विवाहित बहनों को लापरवाहीपूर्वक और षड्यंत्र के ज़रिये दोषी ठहराने की निंदा की।

मुख्य दिशा-निर्देश :

Sushil Kumar Sharma v. Union of India

यह उन शुरुआती मामलों में से एक है जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि धारा 498A का दुरुपयोग कानूनी आतंकवाद के समान है।

मुख्य दिशा-निर्देश:

गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं – स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णयों में लगातार यह माना है कि गिरफ्तारी अपवाद है, नियम नहीं, विशेषकर वैवाहिक विवादों में। विवाह संवैधानिक अधिकारों को निलंबित नहीं करता। केवल आरोपों के आधार पर कैद उचित नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी है कि गिरफ्तारी संबंधी दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने वाले पुलिस अधिकारी बाध्यकारी कानून का प्रत्यक्ष उल्लंघन करते हैं और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई और अवमानना ​​की कार्यवाही की जा सकती है।

धारा 498A के झूठे केस में फंसाये जाने पर वो महत्त्वपूर्ण कदम जो पुरुषों के लिए ज़रूरी हैं

धारा 498A का दुरुपयोग होने पर पुरुषों के लिए जो सबसे बड़ी समस्या है, घबरा का उनका हार मान लेना। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने आपको पहले ही सुरक्षा उपाय उपलब्ध करा दिए हैं—बशर्ते आप उनका उपयोग करना जानते हों।

धारा 41A CrPC के तहत नोटिस की मांग करें

पुलिस स्वतः गिरफ्तार नहीं कर सकती। उन्हें उपस्थिति का नोटिस जारी करना होगा।
किसी भी उल्लंघन को मजिस्ट्रेट या उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।

अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करें (धारा 438 CrPC)

Arnesh Kumar का हवाला दें। न्यायालय उचित दिशा-निर्देशों का पालन करने पर नियमित रूप से अंतरिम सुरक्षा और गिरफ्तारी निषेध निर्देश प्रदान करते हैं।

धारा 482 CrPC के तहत मामला रद्द करने की मांग करें

उच्च न्यायालय FIR को निम्नलिखित स्थितियों में रद्द कर सकते हैं:

आपराधिक कानून अनुमानों पर आधारित नहीं हो सकता।

धारा 498A के तहत झूठे मामलों की कठोर सच्चाई

498A के झूठे मामले महज़ एक “घरेलू विवाद” नहीं हैं। इसमें मुक़दमे का फैसला बाद में आता है पर सजा पहले ही सुनाई जाती है।

एकतरफा जवाबदेही से न्याय कायम नहीं रह सकता।

निष्कर्ष

 सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक सीमाएँ निर्धारित करके अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है। लेकिन सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से सुधार नहीं लाया जा सकता। जब तक झूठे शिकायतकर्ताओं को कानूनी रूप से जवाबदेह नहीं ठहराया जाता, तब तक निर्दोष लोगों के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ही एकमात्र ढाल बने रहेंगे, न कि स्वयं कानून। न्याय सबके लिए बराबर होने चाहिए ना कि सिर्फ उनके लिए जो इसका चयन करते हैं। स्वतंत्रता को लिंग के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता।

498A के तहत झूठे मामलों में लागू कानून व विधिक धाराएँ

धारा (Section)अधिनियम (Act)498A के झूठे मामलों में भूमिका
Section 498Aभारतीय दंड संहिता (IPC)पति या उसके परिजनों द्वारा की गई क्रूरता को अपराध घोषित करती है; असल में इसका दुरुपयोग होता है और बिना जाँच प्रक्रिया के तत्काल गिरफ्तारी हो जाती है  
Article 21भारत का संविधान (COI)जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार; झूठे मामलों में मनमानी गिरफ्तारी से इस अधिकार का उल्लंघन होता है  
Section 41दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)गिरफ्तारी की शर्तें निर्धारित की जाती है; पुलिस को गिरफ्तारी से पहले इसकी आवश्यकता को लिखित रूप में उचित ठहराना जरूरी  
Section 41Aदंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)पुलिस के समक्ष उपस्थिति का नोटिस देना अनिवार्य; 498A के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया प्रमुख सुरक्षा उपाय  
Section 438दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत का प्रावधान; झूठे व दुर्भावनापूर्ण मामलों में महत्वपूर्ण राहत  
Section 482दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)हाई कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियाँ; झूठे और प्रतिशोध की भावना से या कानून के दुरुपयोग वाले मामलों को रद्द करने का अधिकार  

मुख्य बातें (Key Takeaways)

FAQs

क्या धारा 498A में पुलिस तुरंत पति को गिरफ्तार कर सकती है?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गिरफ्तारी स्वतः नहीं होती। पुलिस को गिरफ्तारी से पहले धारा 41 और 41A CrPC का पालन करना अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट का कौन-सा निर्णय 498A के झूठे मुक़दमे में पुरुषों को गिरफ़्तारी से बचाता है?
Arnesh Kumar V. State of Bihar का निर्णय। इस फैसले में अवैध गिरफ्तारी को दंडनीय बताया गया और हिरासत सौंपने से पहले कारण दर्ज करना अनिवार्य किया गया।

क्या 498A की झूठी FIR को हाई कोर्ट रद्द कर सकता है?
हाँ। यदि FIR में आरोप अस्पष्ट, सामूहिक या दुर्भावनापूर्ण हों, तो धारा482 CrPC के तहत FIR रद्द की जा सकती है।

क्या बिना सबूत माता-पिता व रिश्तेदारों को 498A में गिरफ्तार किया जा सकता है?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार बिना विशिष्ट भूमिका और ठोस प्रमाण के परिजनों को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।

क्या सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि धारा 498A का दुरुपयोग होता है?
हाँ। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में इसके बड़े पैमाने पर दुरुपयोग को स्वीकार किया है और 498A को कानूनी रूप से वसूली का हथियार ना बनाने की हिदायत दी है ।

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