DV Act का नोटिस मिलते ही घबराएं नहीं: एक गलती पति का पूरा केस बिगाड़ सकती है। पत्नी ने झूठा घरेलू हिंसा केस कर दिया है? जानिए DV Act नोटिस, अंतरिम भरण-पोषण, एकतरफा आदेश, अपील, हाई कोर्ट क्वैशिंग और साक्ष्य की पूरी कानूनी रणनीति।
NEW DELHI: पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत केस दायर कर दिया है। उसमें मारपीट, दहेज, गाली-गलौज, आर्थिक शोषण, घर से निकालने और भरण-पोषण न देने जैसे आरोप लिखे हैं। पति का कहना है कि आरोप झूठे हैं।
अब पति क्या करे?
सबसे पहले एक बात स्पष्ट समझ लीजिए:
DV Act की धारा 12 का नोटिस अपने आप में न तो एफआईआर है और न ही गिरफ्तारी वारंट। लेकिन इस नोटिस को नजरअंदाज करना एकतरफा आदेश, भारी बकाया भरण-पोषण और बाद में गंभीर कानूनी कार्रवाई का रास्ता खोल सकता है।
घरेलू हिंसा कानून का उद्देश्य वास्तविक पीड़ित महिलाओं को सुरक्षा देना है। लेकिन किसी भी कल्याणकारी कानून का इस्तेमाल यदि वैवाहिक बदला लेने, बढ़ा-चढ़ाकर आर्थिक दावा करने या पति और उसके पूरे परिवार को दबाव में लाने के लिए किया जाए, तो पति को चुपचाप समर्पण नहीं करना चाहिए।
झूठा मुकदमा गुस्से से नहीं, रिकॉर्ड से टूटता है।
30 सेकंड में सीधा उत्तर: झूठा DV केस होने पर पति क्या करे?
पति को तत्काल ये कदम उठाने चाहिए:
- नोटिस और पूरी शिकायत की प्रति प्राप्त करें।
- पहली तारीख पर उपस्थिति सुनिश्चित करें; केस को एकतरफा न होने दें।
- हर आरोप का तारीखवार और दस्तावेज़-आधारित उत्तर तैयार करें।
- बैंक विवरण, आयकर रिटर्न और आय-संपत्ति का पूर्ण शपथपत्र दाखिल करें।
- व्हाट्सऐप चैट, ईमेल, सीसीटीवी, यात्रा रिकॉर्ड और चिकित्सा दस्तावेज सुरक्षित रखें।
- पहले से चल रहे भरण-पोषण या पारिवारिक मामलों की जानकारी न्यायालय को दें।
- अंतरिम या एकतरफा आदेश को समय पर चुनौती दें।
- परिस्थिति बदलने पर धारा 25(2) में आदेश संशोधित कराने का आवेदन दें।
- असाधारण मामलों में हाई कोर्ट से कार्यवाही रद्द कराने पर विचार करें।
- झूठे शपथपत्र के विरुद्ध कार्रवाई तभी मांगें जब झूठ जानबूझकर बोला गया, महत्वपूर्ण और प्रमाणित हो।
DV Act के तहत पत्नी क्या-क्या मांग सकती है?
महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 केवल शारीरिक मारपीट तक सीमित नहीं है। इसमें शारीरिक, लैंगिक, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार शामिल हो सकता है।
पत्नी या अन्य पात्र महिला मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 12 का आवेदन देकर मुख्य रूप से निम्न राहत मांग सकती है:
धारा 18: संरक्षण आदेश
न्यायालय पति को कथित घरेलू हिंसा करने, पत्नी से संपर्क करने, उसके कार्यस्थल पर जाने या कुछ संपत्तियों का हस्तांतरण करने से रोक सकता है।
धारा 19: निवास आदेश
न्यायालय साझा गृह से बेदखली रोक सकता है, वैकल्पिक आवास अथवा किराया दिला सकता है और मामले के अनुसार निवास संबंधी अन्य निर्देश दे सकता है।
धारा 20: आर्थिक राहत और भरण-पोषण
पत्नी अपने तथा बच्चों के लिए भरण-पोषण, चिकित्सा खर्च, आय की हानि या संपत्ति के नुकसान की राशि मांग सकती है। कानून के अनुसार आर्थिक राहत पर्याप्त, उचित और पक्षकारों के जीवन-स्तर के अनुरूप होनी चाहिए।
धारा 21: बच्चों की अस्थायी अभिरक्षा
मजिस्ट्रेट बच्चे की अस्थायी अभिरक्षा और मुलाकात की व्यवस्था निर्धारित कर सकता है।
धारा 22: मुआवजा
मानसिक पीड़ा और भावनात्मक कष्ट सहित घरेलू हिंसा से हुई क्षति के लिए मुआवजा मांगा जा सकता है।
धारा 23: अंतरिम और एकतरफा आदेश
प्रथम दृष्टया सामग्री मिलने पर मजिस्ट्रेट अंतिम साक्ष्य दर्ज होने से पहले भी अंतरिम आदेश दे सकता है। शपथपत्र के आधार पर एकतरफा आदेश भी पारित हो सकता है।
क्या DV Act की धारा 12 का केस आपराधिक मुकदमा है?
यह सबसे अधिक गलत समझा जाने वाला प्रश्न है।
सुप्रीम कोर्ट ने Shaurabh Kumar Tripathi v. Vidhi Rawal, 2025 INSC 734 में स्पष्ट किया कि धारा 12 का आवेदन सामान्य आपराधिक शिकायत से अलग है। ऐसी कार्यवाही मुख्यतः नागरिक प्रकृति की राहत देने के लिए होती है। धारा 12 का आवेदन स्वयं किसी व्यक्ति को आपराधिक सजा नहीं दिलाता।
अपराध की स्थिति मुख्यतः तब पैदा होती है जब पति किसी संरक्षण आदेश अथवा अंतरिम संरक्षण आदेश का उल्लंघन करता है।
धारा 31 के अनुसार ऐसे उल्लंघन पर:
- एक वर्ष तक का कारावास;
- ₹20,000 तक जुर्माना;
- अथवा दोनों हो सकते हैं।
धारा 32 के अनुसार संरक्षण आदेश के उल्लंघन का अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती है।
इसलिए यह कहना गलत होगा कि धारा 12 का नोटिस मिलते ही पति की गिरफ्तारी निश्चित है। लेकिन यह भी उतना ही खतरनाक होगा कि पति आदेश की अवहेलना कर दे क्योंकि “मूल केस तो नागरिक प्रकृति का है।”
झूठे DV केस में पति को पहले 72 घंटों में क्या करना चाहिए?
1. नोटिस ही नहीं, पूरा न्यायालयीय रिकॉर्ड प्राप्त करें
केवल नोटिस देखकर उत्तर तैयार न करें। निम्न दस्तावेज प्राप्त करें:
- धारा 12 का मुख्य आवेदन;
- धारा 23 का अंतरिम आवेदन;
- पत्नी का शपथपत्र;
- घरेलू घटना रिपोर्ट;
- संलग्न शिकायतें और दस्तावेज;
- न्यायालय द्वारा पहले से पारित कोई आदेश;
- आय एवं संपत्ति संबंधी शपथपत्र;
- मांगी गई प्रत्येक राहत का विवरण।
कई बार पति केवल मुख्य शिकायत का उत्तर देता है जबकि वास्तविक आर्थिक खतरा धारा 23 के अंतरिम आवेदन में छिपा होता है।
2. पहली तारीख को हल्के में न लें
कानून के अनुसार मजिस्ट्रेट पहली सुनवाई सामान्यतः आवेदन मिलने के तीन दिनों के भीतर तय करने का प्रयास करता है। अधिनियम में 60 दिनों के भीतर निस्तारण का प्रयास करने की बात है, लेकिन यह स्वचालित समाप्ति की अनिवार्य समय-सीमा नहीं है। 60 दिन पूरे होने पर केस अपने आप खारिज नहीं होता।
पति या उसका अधिवक्ता उपस्थित न हो तो धारा 23 के तहत एकतरफा आदेश पारित हो सकता है।
3. पत्नी से सीधे लड़ाई या धमकी बंद करें
नोटिस मिलने के बाद क्रोध में भेजा गया एक संदेश पत्नी के पुराने कमजोर केस को नया मजबूत साक्ष्य दे सकता है।
विशेष रूप से यह न करें:
- गाली या धमकी देना;
- लगातार कॉल करना;
- उसके घर या कार्यालय पहुंचना;
- सोशल मीडिया पर निजी आरोप लगाना;
- बच्चे को जबरन ले जाने का प्रयास करना;
- संरक्षण आदेश के विपरीत संपर्क करना।
यदि न्यायालय ने संपर्क प्रतिबंधित किया है तो केवल अधिवक्ता या न्यायालय द्वारा स्वीकृत माध्यम का प्रयोग करें।
झूठे घरेलू हिंसा केस का सबसे प्रभावी बचाव: आरोपों की समयरेखा
पति का उत्तर केवल यह नहीं होना चाहिए कि “सभी आरोप झूठे हैं।”
ऐसा सामान्य इनकार प्रायः पर्याप्त नहीं होता। प्रत्येक आरोप का अलग उत्तर तैयार होना चाहिए।
एक प्रभावी आरोप-साक्ष्य तालिका में निम्न कॉलम रखें:
| क्रम | पत्नी का आरोप | कथित तारीख व स्थान | पति का उत्तर | स्वतंत्र साक्ष्य | पत्नी के पुराने बयान से विरोधाभास |
| 1 | कथित मारपीट | तारीख/स्थान | घटना से इनकार या वास्तविक तथ्य | सीसीटीवी, यात्रा रिकॉर्ड, चिकित्सा रिकॉर्ड | पुलिस शिकायत में उल्लेख नहीं |
| 2 | घर से निकालना | तारीख | पत्नी स्वयं गई अथवा पति वहां नहीं था | कैब रिकॉर्ड, संदेश, गवाह | पुराने संदेश में अलग कारण |
| 3 | खर्च न देना | अवधि | किए गए भुगतान | बैंक हस्तांतरण, विद्यालय शुल्क | आय शपथपत्र में भुगतान छिपाया |
| 4 | दहेज मांग | कथित अवसर | स्पष्ट उत्तर | विवाह खर्च रिकॉर्ड, बातचीत | पहले समझौते में आरोप अनुपस्थित |
यही तालिका बाद में जिरह, अंतरिम आवेदन, अपील और संभावित हाई कोर्ट याचिका की रीढ़ बनती है।
पति किन दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखे?
वैवाहिक घटनाओं से संबंधित रिकॉर्ड
- विवाह और साथ रहने की वास्तविक अवधि;
- अलगाव की तारीख;
- पत्नी के स्वेच्छा से जाने से संबंधित संदेश;
- समझौते और मध्यस्थता दस्तावेज;
- पूर्व पुलिस शिकायतें;
- परिवार परामर्श केंद्र का रिकॉर्ड;
- तलाक, भरण-पोषण या अभिरक्षा मामलों की प्रतियां;
- पत्नी द्वारा भेजे गए नोटिस और उत्तर।
आर्थिक रिकॉर्ड
- पिछले तीन वर्षों के आयकर रिटर्न;
- वेतन पर्चियां;
- बैंक और क्रेडिट कार्ड विवरण;
- ऋण की ईएमआई;
- किराए के दस्तावेज;
- माता-पिता और बच्चों पर वास्तविक व्यय;
- विद्यालय शुल्क और चिकित्सा खर्च;
- पत्नी को किए गए बैंक हस्तांतरण;
- संयुक्त खाते और निवेश;
- व्यवसाय की बैलेंस शीट, जीएसटी रिकॉर्ड और वास्तविक नकदी प्रवाह।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य
- मूल व्हाट्सऐप चैट;
- ईमेल;
- कॉल रिकॉर्ड का वैधानिक विवरण;
- फोटो और वीडियो की मूल फाइल;
- सीसीटीवी रिकॉर्ड;
- यात्रा और स्थान संबंधी रिकॉर्ड;
- डिजिटल भुगतान;
- क्लाउड बैकअप।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम के स्थान पर 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धाराएं 61 से 63 इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता नियंत्रित करती हैं। इलेक्ट्रॉनिक सामग्री प्रस्तुत करते समय स्रोत, उपकरण, रिकॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया और आवश्यक प्रमाणपत्र का ध्यान रखना आवश्यक है।
स्क्रीनशॉट लेकर मूल चैट मिटा देना गंभीर गलती है। महत्वपूर्ण डिजिटल सामग्री को काटें, संपादित या कृत्रिम रूप से साफ न करें। मूल उपकरण, निर्यातित चैट, मेटाडेटा और बैकअप सुरक्षित रखें।
किसी का पासवर्ड तोड़कर, स्पाइवेयर लगाकर या अवैध रूप से फोन रिकॉर्ड करके साक्ष्य न जुटाएं। अवैध तरीके से जुटाई गई सामग्री स्वयं पति को नई कानूनी परेशानी में डाल सकती है।
पत्नी के आरोपों का पैरा-वाइज उत्तर कैसे तैयार करें?
एक मजबूत लिखित उत्तर में पांच भाग होने चाहिए:
पहला भाग: प्रारंभिक आपत्तियां
यहां आवश्यकता के अनुसार निम्न बिंदु उठाए जा सकते हैं:
- न्यायालय का क्षेत्राधिकार;
- पक्षकारों के बीच वास्तविक घरेलू संबंध;
- साझा गृह के तथ्य;
- पूर्व मुकदमे और समझौते;
- समान आरोपों पर पहले हुए आदेश;
- आवश्यक पक्षकारों की स्थिति;
- अस्पष्ट और सर्वव्यापी आरोप;
- महत्वपूर्ण तथ्यों का छिपाया जाना।
दूसरा भाग: सही वैवाहिक समयरेखा
विवाह, साथ रहने, स्थान परिवर्तन, विवाद, अलगाव, समझौते और मुकदमों की तारीखवार समयरेखा दें।
तीसरा भाग: प्रत्येक आरोप का अलग उत्तर
“गलत और अस्वीकार” लिखकर आगे न बढ़ें। जहां संभव हो, उसी अनुच्छेद में विरोधी दस्तावेज का उल्लेख करें।
चौथा भाग: पत्नी की आर्थिक स्थिति
पत्नी की योग्यता और केवल “काम करने की क्षमता” पर निर्भर न रहें। वास्तविक आय, रोजगार, बैंक क्रेडिट, कारोबार, किराया, निवेश या अन्य संसाधनों का प्रमाण दें।
पांचवां भाग: स्पष्ट प्रार्थना
मामले के अनुसार शिकायत खारिज करने, अंतरिम राहत अस्वीकार करने, दस्तावेज प्रस्तुत कराने, आय का सत्यापन कराने या अन्य उपयुक्त आदेश की प्रार्थना करें।
अंतरिम भरण-पोषण के मामले में पति की सबसे बड़ी गलतियां
गलती 1: अपनी आय छिपाना
पति प्रायः सोचता है कि कम आय दिखाकर भरण-पोषण कम हो जाएगा। लेकिन बैंक जमा, आयकर रिकॉर्ड, जीवन-शैली, संपत्ति, कारोबार और खर्चों में विरोधाभास सामने आने पर उसकी विश्वसनीयता समाप्त हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने Rajnesh v. Neha, (2021) 2 SCC 324 में सभी भरण-पोषण मामलों के लिए आय, संपत्ति और देनदारियों के विस्तृत शपथपत्र का प्रारूप निर्धारित किया। उत्तरदाता को सामान्यतः उत्तर के साथ चार सप्ताह के भीतर शपथपत्र दाखिल करना चाहिए। जानबूझकर देरी होने पर न्यायालय बचाव बंद करने अथवा उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय करने पर विचार कर सकता है।
गलती 2: पत्नी शिक्षित है, इसलिए उसे कुछ नहीं मिलेगा
केवल डिग्री, आयु या रोजगार की क्षमता यह सिद्ध नहीं करती कि पत्नी वास्तव में पर्याप्त आय अर्जित कर रही है।
Rakesh Ray v. Priti Ray, दिल्ली हाई कोर्ट, 16 फरवरी 2026 में न्यायालय ने कहा कि अधूरे बैंक विवरण मात्र के आधार पर पत्नी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता, खासकर जब उसकी वास्तविक आय का कोई ठोस प्रमाण न हो।
पति को यह दिखाना होगा कि पत्नी:
- वर्तमान में काम कर रही है;
- कितना कमा रही है;
- किस संस्था या कारोबार से कमा रही है;
- उसके खाते में नियमित आय कहां से आ रही है;
- उसने आय या संपत्ति छिपाई है या नहीं।
गलती 3: अप्रमाणित तस्वीरों से चरित्र आरोप लगाना
Ateet Jain v. Chhavi Jain, दिल्ली हाई कोर्ट, 4 फरवरी 2026 में पति ने कथित आपत्तिजनक तस्वीरों के आधार पर पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण से वंचित करने की मांग की। न्यायालय ने कहा कि ऐसी तस्वीरें अभी कानून के अनुसार सिद्ध नहीं हुई थीं और पत्नी ने उन्हें संपादित तथा जाली बताया था। केवल अप्रमाणित संबंध के आरोप पर अंतरिम भरण-पोषण रोका नहीं जा सकता।
संदेश स्पष्ट है: अदालत सबूत देखती है, सनसनी नहीं।
गलती 4: समानांतर भरण-पोषण आदेश छिपाना
पत्नी ने यदि किसी अन्य कार्यवाही में भरण-पोषण या आर्थिक राहत प्राप्त की है तो DV Act की धारा 26(3) के अनुसार इसकी जानकारी मजिस्ट्रेट को देना आवश्यक है। पति को सभी पूर्व आदेश न्यायालय के रिकॉर्ड पर रखकर समायोजन की मांग करनी चाहिए।
एक ही अवधि के लिए विभिन्न कार्यवाहियों में निर्धारित राशियों को जोड़कर अनुचित दोहरा लाभ नहीं दिया जाना चाहिए; न्यायालय आवश्यक समायोजन कर सकता है।
एकतरफा आदेश हो जाए तो पति क्या करे?
यदि पति की अनुपस्थिति में अंतरिम भरण-पोषण, निवास या संरक्षण आदेश पारित हो गया है तो उसे नजरअंदाज न करें।
मामले के अनुसार पति निम्न उपायों पर विचार कर सकता है:
आदेश और सेवा रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रति लें
जांचें कि नोटिस वास्तव में कब और कैसे तामील हुआ था। गलत पता, अपूर्ण सेवा या अनुपस्थिति के वास्तविक कारण का प्रमाण रखें।
आदेश वापस लेने या संशोधित करने का आवेदन
परिस्थिति और न्यायालय द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया के आधार पर एकतरफा आदेश हटाने, सुनवाई देने या अंतरिम राहत संशोधित करने का अनुरोध किया जा सकता है।
धारा 25(2) का आवेदन
यदि आय, रोजगार, स्वास्थ्य, बच्चों के खर्च अथवा अन्य महत्वपूर्ण परिस्थितियों में परिवर्तन हुआ है तो मजिस्ट्रेट आदेश को बदल, संशोधित या निरस्त कर सकता है।
धारा 29 के तहत अपील
मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध सत्र न्यायालय में अपील की जा सकती है। अधिनियम के अनुसार अपील आदेश की तामील से 30 दिनों के भीतर दायर की जानी चाहिए।
अपील लंबित होने मात्र से आदेश स्वतः स्थगित नहीं होता। आवश्यक हो तो अलग से स्थगन की मांग करें।
क्या हाई कोर्ट झूठा DV केस रद्द कर सकता है?
हां, लेकिन हर मामले में नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने Shaurabh Kumar Tripathi v. Vidhi Rawal, 2025 INSC 734 में निर्णय दिया कि हाई कोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग करते हुए धारा 12 की कार्यवाही रद्द कर सकता है। वर्तमान व्यवस्था में यह शक्ति परिस्थितियों के अनुसार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 अथवा पूर्व मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 से संबंधित हो सकती है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही चेतावनी दी कि हाई कोर्ट को यह शक्ति बहुत सावधानी से प्रयोग करनी चाहिए। केवल इसलिए क्वैशिंग नहीं होगी कि पति आरोपों को झूठा बताता है।
हाई कोर्ट का हस्तक्षेप सामान्यतः तब उचित हो सकता है जब:
- शिकायत पढ़ने पर भी आवश्यक कानूनी तत्व न बनें;
- आरोप अत्यंत अस्पष्ट और सर्वव्यापी हों;
- संबंधित व्यक्ति कभी साझा गृह में रहा ही न हो;
- निर्विवाद दस्तावेज आरोपों को असंभव बनाते हों;
- पहले से बाध्यकारी समझौता मौजूद हो;
- कार्यवाही स्पष्ट रूप से न्यायालयीय प्रक्रिया का दुरुपयोग हो;
- आरोप किसी वैध न्यायालयीय आदेश से सीधे टकराते हों।
जहां तथ्य विवादित हों और साक्ष्य दर्ज करना आवश्यक हो, वहां हाई कोर्ट सामान्यतः मुकदमे का लघु परीक्षण नहीं करेगा।
2026 में दिल्ली हाई कोर्ट ने कब DV कार्यवाही रद्द की?
Sandeep Pathak and Others v. Lalita Tiwari
दिल्ली हाई कोर्ट ने 10 मार्च 2026 को Sandeep Pathak and Others v. Lalita Tiwari, CRL.M.C. 297 एवं 485/2021 में DV शिकायत और संबंधित एफआईआर की समीक्षा की।
न्यायालय ने पाया कि शिकायत में:
- किसी विशेष घरेलू हिंसा की स्पष्ट घटना नहीं थी;
- समय, प्रकृति और तरीके का विवरण नहीं था;
- कई परिवारजनों के विरुद्ध सामान्य और व्यापक आरोप थे।
हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे अस्पष्ट और सर्वव्यापी आरोप DV Act की कार्यवाही बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
यह निर्णय यह नहीं कहता कि हर संक्षिप्त शिकायत रद्द हो जाएगी। इसका वास्तविक सिद्धांत यह है कि किस व्यक्ति ने, कब, कहां और क्या किया—इन बुनियादी विवरणों के बिना पूरे परिवार को मुकदमे में घसीटना न्यायालयीय जांच में टिक नहीं सकता।
समझौते के बाद नया DV केस: सुप्रीम कोर्ट का 2026 का निर्णय
Dhananjay Rathi v. Ruchika Rathi, 2026 INSC 360
इस मामले में पक्षकारों ने मध्यस्थता के माध्यम से विस्तृत समझौता किया था। समझौते में आर्थिक भुगतान, संपत्ति, आभूषण, तलाक और भविष्य में वैवाहिक विवाद से संबंधित नए नागरिक या आपराधिक मामले न करने की शर्तें थीं। बाद में पत्नी ने DV कार्यवाही शुरू की।
सुप्रीम कोर्ट ने 13 अप्रैल 2026 को विशेष परिस्थितियों में DV Complaint No. 3186/2025 रद्द कर दी। न्यायालय ने समझौते के बड़े हिस्से के पालन, भविष्य के मुकदमों पर सहमति और बाद की कार्यवाही की परिस्थितियों पर विचार किया।
यह निर्णय कोई सार्वभौमिक नियम नहीं बनाता कि “समझौता होते ही हर DV केस खत्म हो जाएगा।” परिणाम समझौते की भाषा, उसके पालन, कथित नई घटनाओं, धोखाधड़ी या दबाव के आरोप और प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।
वास्तविक न्यायालयीय तर्क और निर्णय में दर्ज न्यायिक उत्तर
निम्न संवाद निर्णयों में दर्ज तर्कों और निष्कर्षों का हिन्दी भावार्थ है; कोई काल्पनिक कोर्टरूम वार्तालाप नहीं है।
न्यायालयीय प्रश्न 1: क्या एक वर्ष बाद दायर DV आवेदन समय-बाधित है?
पति का तर्क: कथित घटनाएं पुरानी हैं; एक वर्ष बाद आवेदन स्वीकार नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का उत्तर: धारा 12 का आवेदन किसी अपराध का अभियोजन शुरू करना नहीं है। DV Act में अपराध तब उत्पन्न होता है जब संरक्षण आदेश का उल्लंघन किया जाता है। इसलिए धारा 12 का आवेदन केवल एक वर्ष बीतने से स्वतः समय-बाधित नहीं हो जाता।
यह सिद्धांत Kamatchi v. Lakshmi Narayanan, 13 अप्रैल 2022 में निर्धारित किया गया।
न्यायालयीय प्रश्न 2: क्या हाई कोर्ट धारा 12 की पूरी कार्यवाही रद्द कर सकता है?
प्रश्न: जब DV कार्यवाही मुख्यतः नागरिक प्रकृति की है तो क्या धारा 482 CrPC अथवा धारा 528 BNSS प्रयोग की जा सकती है?
सुप्रीम कोर्ट का उत्तर: हां। न्यायालयीय प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए हाई कोर्ट कार्यवाही रद्द कर सकता है, लेकिन इस शक्ति का प्रयोग दुर्लभ और स्पष्ट मामलों में होना चाहिए।
यह उत्तर Shaurabh Kumar Tripathi v. Vidhi Rawal में दिया गया।
न्यायालयीय प्रश्न 3: क्या पत्नी आपसी तलाक की सहमति वापस ले सकती है?
सुप्रीम कोर्ट का उत्तर: अंतिम डिक्री से पहले आपसी तलाक की सहमति वापस लेना कानूनन संभव है। लेकिन विस्तृत, प्रमाणित और बड़े स्तर पर लागू किए जा चुके मध्यस्थता समझौते की अन्य बाध्यकारी शर्तों से बिना वैध आधार पीछे हटना अलग प्रश्न है।
यह निष्कर्ष Dhananjay Rathi v. Ruchika Rathi के विशिष्ट तथ्यों में आया।
क्या वर्षों बाद दायर DV केस अपने आप झूठा माना जाएगा?
नहीं।
लंबी देरी पति के बचाव में महत्वपूर्ण परिस्थिति हो सकती है, लेकिन केवल देरी से शिकायत स्वतः समाप्त नहीं होती।
Kamatchi v. Lakshmi Narayanan में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक वर्ष वाली सीमा धारा 12 के आवेदन पर इस प्रकार लागू नहीं होती। हालांकि न्यायालय कथित घटनाओं, अलगाव की अवधि, पूर्व मौन, पुराने समझौतों और कथित निरंतर आर्थिक शोषण सहित सभी तथ्यों पर विचार कर सकता है।
इसलिए सही बचाव यह नहीं है कि “केस देर से आया है, इसलिए खत्म।” सही बचाव है:
- कथित घटना और शिकायत के बीच की देरी दिखाना;
- देरी का कोई स्पष्टीकरण न होना दिखाना;
- बीच के वर्षों के सामान्य संबंध या विरोधी संदेश प्रस्तुत करना;
- यह दिखाना कि शिकायत किसी अन्य मुकदमे के बाद दबाव बनाने के लिए दायर हुई;
- प्रत्येक आरोप को दस्तावेजों से असत्य या असंभव सिद्ध करना।
झूठा शपथपत्र देने पर पत्नी के विरुद्ध क्या कार्रवाई हो सकती है?
हर गलत बयान अपने आप झूठी गवाही का अपराध नहीं बनता।
कार्रवाई के लिए सामान्यतः यह दिखाना आवश्यक होगा कि:
- बयान महत्वपूर्ण तथ्य से संबंधित था;
- बयान शपथ या कानूनी घोषणा पर दिया गया;
- बयान देने वाली व्यक्ति जानती थी कि वह झूठा है;
- झूठ केवल सामान्य अतिशयोक्ति या स्मृति की भूल नहीं था;
- न्यायहित में अभियोजन आवश्यक है।
1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 227 झूठा साक्ष्य देने और धारा 228 झूठा साक्ष्य गढ़ने से संबंधित है। न्यायालयीय कार्यवाही में झूठे साक्ष्य के लिए धारा 229 के अंतर्गत दंड हो सकता है।
वर्तमान प्रक्रिया में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 379 के तहत संबंधित न्यायालय, आवेदन पर या स्वयं, यह जांच सकता है कि न्यायहित में लिखित शिकायत करना आवश्यक है या नहीं। न्यायालय प्रारंभिक जांच कर सकता है और फिर सक्षम मजिस्ट्रेट को शिकायत भेज सकता है।
पुराने मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 340 और भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराएं लागू हो सकती हैं।
रणनीतिक चेतावनी: केस की शुरुआत में हर विरोधाभास पर झूठी गवाही का आवेदन दायर करना कई बार मुख्य बचाव से ध्यान भटका देता है। पहले झूठ को दस्तावेज से स्थापित करें। फिर देखें कि वह झूठ निर्णय के लिए कितना महत्वपूर्ण था।
पति को कौन-सी गलतियां बिल्कुल नहीं करनी चाहिए?
नोटिस की उपेक्षा
अनुपस्थिति से एकतरफा आदेश हो सकता है और बाद में बकाया राशि बढ़ती रह सकती है।
आय अथवा संपत्ति छिपाना
नकली ऋण, अचानक संपत्ति हस्तांतरण या गलत आय शपथपत्र पति की पूरी विश्वसनीयता नष्ट कर सकते हैं।
आदेश का उल्लंघन
संरक्षण आदेश के उल्लंघन से अलग संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध बन सकता है।
डिजिटल साक्ष्य मिटाना
संदेश, फोन या ईमेल हटाने से प्रतिकूल निष्कर्ष निकल सकता है और पति स्वयं अपना सर्वोत्तम बचाव नष्ट कर देता है।
सार्वजनिक चरित्र-हनन
न्यायालय में सिद्ध किए बिना सोशल मीडिया पर पत्नी के निजी या लैंगिक जीवन के आरोप प्रकाशित करना मानहानि, गोपनीयता और अन्य कानूनी जोखिम उत्पन्न कर सकता है।
बच्चों को हथियार बनाना
बच्चे को मां के विरुद्ध बयान सिखाना या मुलाकात के आदेश का उल्लंघन करना पति के अभिरक्षा मामले को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
आधारहीन जवाबी मुकदमे
हर DV केस के जवाब में कई आपराधिक शिकायतें दाखिल करना रणनीति नहीं है। वही कार्रवाई करें जिसके लिए स्वतंत्र तथ्य और साक्ष्य उपलब्ध हों।
पति की व्यावहारिक कानूनी रणनीति
एक प्रभावी DV बचाव सामान्यतः चार स्तरों पर तैयार होता है:
स्तर 1: अंतरिम आदेश रोकना या नियंत्रित करना
पहली तारीख, पैरा-वाइज उत्तर, आय शपथपत्र और तत्काल दस्तावेजों पर ध्यान दें।
स्तर 2: पत्नी की कहानी में विरोधाभास स्थापित करना
उसकी DV शिकायत की तुलना निम्न से करें:
- पुलिस शिकायत;
- दहेज या क्रूरता की एफआईआर;
- तलाक याचिका;
- भरण-पोषण आवेदन;
- कानूनी नोटिस;
- मध्यस्थता बयान;
- आय शपथपत्र;
- पुराने संदेश;
- चिकित्सा रिकॉर्ड।
एक ही घटना की चार अलग कहानियां जिरह में महत्वपूर्ण बन सकती हैं।
स्तर 3: मुकदमे का आर्थिक नियंत्रण
सभी न्यायालयों में चल रहे भरण-पोषण मामलों की सूची बनाएं। भुगतान केवल दस्तावेजी माध्यम से करें। आदेश में अस्पष्टता हो तो स्पष्टीकरण मांगें; स्वयं भुगतान रोकने का निर्णय न लें।
स्तर 4: अपील या हाई कोर्ट
गलत अंतरिम आदेश के विरुद्ध समय पर अपील करें। पूरी कार्यवाही रद्द कराने की मांग केवल तब करें जब रिकॉर्ड पर स्पष्ट कानूनी दोष या न्यायालयीय प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग दिखता हो।
महत्वपूर्ण निर्णय: एक नजर में
Kamatchi v. Lakshmi Narayanan, सुप्रीम कोर्ट, 13 अप्रैल 2022
सिद्धांत: धारा 12 का आवेदन केवल इस आधार पर समय-बाधित नहीं कि कथित घटना को एक वर्ष से अधिक हो गया है। अपराध संरक्षण आदेश के उल्लंघन पर उत्पन्न होता है।
Rajnesh v. Neha, सुप्रीम कोर्ट
सिद्धांत: भरण-पोषण मामलों में दोनों पक्षों द्वारा आय, संपत्ति और देनदारियों का विस्तृत शपथपत्र; आय छिपाने या मांग बढ़ाने पर न्यायालय दस्तावेज तलब कर सकता है।
Shaurabh Kumar Tripathi v. Vidhi Rawal, 2025 INSC 734
सिद्धांत: हाई कोर्ट DV Act की धारा 12 की कार्यवाही रद्द कर सकता है, लेकिन केवल स्पष्ट अन्याय, गंभीर अवैधता या प्रक्रिया के दुरुपयोग वाले मामलों में।
Dhananjay Rathi v. Ruchika Rathi, 2026 INSC 360
सिद्धांत: विस्तृत मध्यस्थता समझौते, उसके पर्याप्त पालन और भविष्य के मुकदमों पर सहमति जैसी विशिष्ट परिस्थितियों में बाद की DV कार्यवाही रद्द की गई।
Sandeep Pathak and Others v. Lalita Tiwari, दिल्ली हाई कोर्ट, 10 मार्च 2026
सिद्धांत: समय, प्रकृति, तरीके और व्यक्ति की भूमिका बताए बिना पूरे परिवार पर लगाए गए अस्पष्ट आरोप कार्यवाही बनाए रखने के लिए अपर्याप्त हो सकते हैं।
Rakesh Ray v. Priti Ray, दिल्ली हाई कोर्ट, 16 फरवरी 2026
सिद्धांत: पत्नी की शिक्षा या रोजगार-योग्यता मात्र से भरण-पोषण नहीं रोका जा सकता; वास्तविक आय और ठोस सामग्री महत्वपूर्ण है।
Ateet Jain v. Chhavi Jain, दिल्ली हाई कोर्ट, 4 फरवरी 2026
सिद्धांत: अप्रमाणित संबंध के आरोप या विवादित तस्वीरें अकेले अंतरिम भरण-पोषण रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
मेरा स्पष्ट मत
मैं वर्षों से वैवाहिक कानूनों के दुरुपयोग से प्रभावित पुरुषों को देखता आया हूं। सबसे बड़ी समस्या केवल झूठा आरोप नहीं होता। समस्या यह भी होती है कि पुरुष नोटिस मिलने के बाद या तो डरकर गलत समझौता कर लेता है या क्रोध में ऐसी प्रतिक्रिया देता है जो पत्नी के कमजोर केस को मजबूत बना देती है।
कानून का दुरुपयोग कानून तोड़कर नहीं रोका जा सकता।
पति को चाहिए कि वह:
- हर आरोप की तारीख मांगे;
- हर आर्थिक दावे का प्रमाण मांगे;
- अपना रिकॉर्ड साफ रखे;
- न्यायालय के आदेश का पालन करे;
- विरोधाभासों को दस्तावेजों से सामने लाए;
- और सही समय पर सही न्यायालय में चुनौती दे।
पत्नी का आरोप साक्ष्य नहीं है। लेकिन पति का केवल इनकार भी बचाव नहीं है।
अदालत में वही पक्ष मजबूत होता है जिसकी कहानी दस्तावेज, तारीख और स्वतंत्र रिकॉर्ड से मेल खाती है।
निष्कर्ष
झूठा घरेलू हिंसा केस पति और उसके परिवार के लिए आर्थिक, मानसिक और सामाजिक संकट पैदा कर सकता है। लेकिन डर, धमकी, आय छिपाना और तारीखों पर अनुपस्थित रहना समस्या को कई गुना बढ़ा देता है।
पति का बचाव तीन शब्दों पर आधारित होना चाहिए:
रिकॉर्ड। विरोधाभास। समयबद्ध कार्रवाई।
हर आरोप को तारीख से बांधिए। हर तारीख को दस्तावेज से जांचिए। हर आर्थिक दावे को बैंक रिकॉर्ड से मिलाइए। आदेश गलत है तो समय पर अपील कीजिए। शिकायत स्पष्ट रूप से न्यायालयीय प्रक्रिया का दुरुपयोग है तो उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाइए।
झूठा केस शोर से नहीं टूटता। वह उस दिन टूटता है जब आरोप के सामने निर्विवाद रिकॉर्ड रख दिया जाता है।
FAQ’S
नहीं। धारा 12 का आवेदन स्वयं गिरफ्तारी वारंट नहीं है। लेकिन संरक्षण आदेश के उल्लंघन पर धारा 31 और 32 के तहत संज्ञेय तथा गैर-जमानती अपराध बन सकता है।
हां। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धारा 12 का आवेदन केवल एक वर्ष बीतने से स्वतः समय-बाधित नहीं होता। देरी मामले के गुण-दोष पर महत्वपूर्ण हो सकती है।
हां। धारा 23 के तहत प्रथम दृष्टया सामग्री और शपथपत्र के आधार पर अंतरिम अथवा एकतरफा आदेश पारित किया जा सकता है। पति को तुरंत उसे उचित न्यायालय में चुनौती देनी चाहिए।
धारा 29 के अनुसार आदेश की तामील से 30 दिनों के भीतर सत्र न्यायालय में अपील दायर की जा सकती है।
हां, लेकिन कार्रवाई स्वचालित नहीं है। झूठ जानबूझकर दिया गया, महत्वपूर्ण और प्रमाणित होना चाहिए। वर्तमान मामलों में न्यायालय से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 379 के तहत कार्रवाई की मांग की जा सकती है।
लेखक परिचय
शोनी कपूर एक पुरुष अधिकार कार्यकर्ता एवं कानूनी सलाहकार हैं। उन्हें भारत के विभिन्न न्यायालयों में वादी और बाद में कार्यकर्ता के रूप में लगभग 18 वर्षों का अनुभव है। वह वैवाहिक कानून, DV Act, धारा 498A, भरण-पोषण, तलाक, अभिरक्षा, मध्यस्थता तथा मुकदमे से पहले की रणनीति से संबंधित मामलों में परामर्श देते हैं।
कानूनी अस्वीकरण
यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है। प्रत्येक DV मामला उसके आरोपों, दस्तावेजों, स्थान, पूर्व कार्यवाहियों और आदेशों पर निर्भर करता है। किसी आवेदन, अपील, भुगतान रोकने, संपर्क करने या न्यायालयीय आदेश के विरुद्ध कदम उठाने से पहले मामले के पूरे रिकॉर्ड के साथ योग्य अधिवक्ता से सलाह लें।